ए रब हमारे फिर से कोई मोजिज़ा कर दे
जिस तरह पिछली उम्मतों पर मन्ना उतारा ऊंटनी भेजी
दुख्तराने मिल्लत के लिए ग़ैबी रिश्ते पैदा कर दे
उम्मा के हर दुखी वाल्दैन की अज़ीयत दूर कर दे
सिफ़त में जो हो फ़रिश्ता ईमान का दर्जा हो पुख़्ता
गर मिल्लत की बेटियाँ हो सरकश
फ़रिश्ते की सिफ़त पा कर हो जाएँ समकक्ष
ज़ख़्म-ए-जिगर हो रहे थे पुर, फ़िर किसी ने हरे कर दिए तेरा नाम लेकर
फ़िर तेरी याद लाई
है मुझे मैख़ाने में फिर तेरा ख़्याल लाया है बुतख़ाने में
क्या फ़साना लिखूं दिल ए बेक़रार का
फ़िर वही इश्तियाक़ का आग़ाज़ हुआ है तेरा नाम ले कर
मोहब्बत की उस इन्तहा
को हम पहुंचे
तूने ना जताई मोहब्बत
हम तेरी चाहत को पहुंचे
ख़बर भी ना थी उसको हम मोहब्बत में अपने अंजाम तक पहुंचे
तेरी याद बन गई है मेरा साया, चिराग़ रौशन होते ही नमूदार होता है
अँधेरा होते ही ग़ायब
दीवानों सी सिफ़त हो गई है, नक़ाबपोश को देख रो देता हूँ
खुले रुख़्सार को देख हंस देता हूँ
वोह नक़ाबपोश एहसास तेरा
हुजूम ए आम के सामने रहा पोशीदा
में तमाम आलम से ग़ाफ़िल रहा
तू मुझमे समा गया में तुझ में समा गया
या रब मेरी कैफ़ियत को क़ुव्वत दे
कहीं होश ना खो बैठूं उससे क़ब्ल हाथ थाम ले मुर्शिद
जितना देता है उसको जज़्ब करने की क़ुव्वत दे दे
ए रब हमारे जिन्नातों और फ़रिश्तों वाली मस्जिदों में
नमाज़ अदा करने की है आरज़ू
जहाँ में किसी को ना देखूं कोई मुझे ना देखे
बस दिल में हो माशूक़ का तसव्वुर
बस वोह मुझे देखे में उसको देखूं
सहाफ़ी ज़ुबेर
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