जो कुछ भी उलटा पलटा
था दुरुस्त हो गया
एक हवा का झोंका था आया और चला गया
तू मुझे पहले कियों नहीं मिला राजीव
ज़िन्दगी का तवील अर्सा बर्बाद ना हुआ होता
हक़ीक़त में वोह एक पराया अपनों सा हो गया।
तेरी खुली हुई ज़ुल्फ़ों की छावों में
कुछ पल बिताने की नहीं रही आरज़ू
एक ख़ाकी मेरा मोहसिन हो गया
दरिया की मौजों से जो डरने लगे मल्लाह
क्या साहिल पे सफ़ीना वोह लाएगा
मौजों के अंदर जो शनावरी कश्ती वही मल्लाह साहिल पायेगा
ग़र्क़ होने के डर से जो छोड़ दे हुनर ग़ोता-ज़नी
वोह ग़ोताख़ोर क्या सीपी से पायेगा मोती
सीख ले हुनर नमल (चींटी) से हार नहीं मानती
जब तक फतह ना कर ले चोटी
वोह मक़सद नहीं छोड़ती
फिर ए इंसान कोशिश करने पर तेरी कैसे हार होगी
आला इंसान को
आला अवाम ही मिलता
हूकूमती निज़ाम
में उनका किरदार दिखता
यह शैतान है जो
ज़हन में बस्ता
सहाफ़ी ज़ुबेर
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