नेज़ा जो पेवस्त था ज़ालिम का क़ल्ब ए मोमीन में
उखाड़ कर फ़ेंक दिया निजात मिली बरसों की मशक़्क़त में
माशूक़ की कर आरज़ू, गर मदद ख़ुदा से ना मिले
चिराग़ जिसका तूफ़ानों में भी हो रोशन, ख़ेमा जिसका ना उड़े
वोह चिराग़ क्या बूझे जिसको ईंधन रब की मोहब्बत का मिलता रहे
ज़ाहिर के चिराग़ हुए गुल, बातिन के चिराग़ रोशन रहे
पाक ज़मीन पर मौजूद था ग़ुलाम ए बातिल
नाम में जिसके शरीफ़, फज़ल में जिसके रेहमान
मुजाहिदों के हौसलों, शमशीर को तोड़ ना सका नस्ल ए ज़ालिम
एक जानिब अकेला मुजाहिद दूसरी जानिब ग़ुलाम ज़ालिमों के ज़ालिम
ग़ुलाम है की करता बातिल पर भरोसा
मुजाहिद है जो अल्लाह के सिवा किसी से ना डरता
शरीफ़ों का ख़ुदा हो गया मग़रिब और अमेरिका
अहकाम ए ख़ुदावन्दी तर्क किया पाक ज़मीन को बेच दिया
ख़ौफ़ ख़ुदा से तू ना मरा ख़ौफ़ ए बातिल से मर गया।
ना कर सके तुम अपने मुल्क को ख़ुदमुख़्तार
ग़ुलामी रही फ़ितरत में शरीफ़ों के और ज़ालिम से वफ़ादार
सर-ए-तस्लीम ख़म हुए उसके हर हुकुम पर
मुख़ालेफ़त की नहीं कोई सूरत
एक मर्द मुजाहिद ने ना क़ुबूल की बातिल की ग़ुलामी
तमाम शरीफ़ हो गए उसके मुख़ालिफ़ फिर भी मीज़ान रहा उसका भारी
दुश्मन ए ईमान ने ली ज़ालिम के हरम की ग़ुलामी
मुजाहिद लड़ता रहा ना-हक़ बात ज़ालिम की ना मानी
तेरा जज़बा ईमानी क़ुव्वत देख रब ने तक़दीर बदल डाली
अहल ए आलम के लिए जो थी दुश्वारकून,रब ने कर दी तुम्हारे लिए उसमे आसानी
नई इमारतें तामीर करो चढ़ा दो नया रंग रोग़न
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں