मारते रहेगें जितने आयेगें
सब को मारते जायेगें
ज़ालिमों की हलाकत पर उनके रहनुमा आँसूं बहाते रहेगें
अरब की नस्लों में मौजूद हैं मुनाफ़िक़ कुफ्र यहूद और नसरानी
हलफ़ के बादशाह का मुनाफ़िक़ था मुशीर सलीबी नसरानी
तेरे नाम से शुरू की थी इस जंग को
एक एक हदफ़ फ़तह होता गया में आगे की जानिब बढ़ता गया
कभी था शैतान का हामी और नापाकी मेरा साथी
अब गवारा नहीं बग़ैर वज़ू से एक पल भी रहना मुझको
इश्क़ तेरा सर चढ़ कर बोल रहा, दुश्वार हो गया छुपाना मेरा
कब तक रहूँ इस आलम की क़ैद में अब तो दीदार ए यार करा
बोहोत सख़्त इम्तेहान से गुज़र गई उम्मत ए मुसलमाँ
अब नतीजे का वक़्त आ गया
ख़ुदा ऊरूज देता है उनको जिन्होंने इम्तेहान अपनी ज़हानत से दिया
फ़िराक़ की अज़ीयत हुई ख़तम अब वस्ल का आग़ाज़ हुआ
हिजाबी बच्चिओं को मिलते देख अश्कों से चेहरा भीग गया मेरा
में रहा वही ख़ुदग़र्ज़ उनके मिलन को देख, माशूक़ से वस्ल को सजा बैठा
या ख़ुदा शुक्र तेरा अदा करूँ, या उन मुजाहिदों को कहूँ शुक्रिया
सब कुछ भूल कर हमने तो माशूक़ का हाथ थाम लिया
यह सिफ़त नूरानी है यह हौसला रहमानी है
बग़ैर इबनुल अरबी के ग़ाज़ी को बग़ैर मोईनुद्दीन के ग़ोरी को
मिलती नहीं फ़तह
अपने नफ़्स की जिहाद तू फ़तह कर चूका
अब आगे की जानिब बढ़ तूने मेहबूब मदीना को ख़ुश किया
जंग में जो भी किया जाईज़ किया
हिकमत से काम किया फ़ौजिओं को हलाक किया
दुश्मन के अवाम को गिरफ़्तार कर, अपने यर्ग़मालों को छुड़वा लिया
क़ैदिओं के साथ हुस्न ए सुलूक किया आक़ा की हदीस को ना पामाल किया
तूने मोहब्बत का हक़ अदा कर दिया आक़ा का नाम रोशन कर दिया
मोहब्बत का पैमाना है वही अपने रहनुमा पर जान कर दे क़ुर्बान
वोह रहनुमा पीर हो या मुहम्मद सल्लम पर नाज़िल क़ुरान
सहाफ़ी ज़ुबेर
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