तेरे इश्क़ में कहाँ कहाँ भटक आये हम
तुझको पाने की चाहत
में कभी काबा कभी मदीना चले आये हम
तुझे देखने की आरज़ू हुई इसलिए तुझे बुला लिया मेने
तेरे दीदार पर ज़माने को भूला दिया मेने
वोह चिलमन में बैठे रहे
हम उन्हें देखते रहे वोह हमें देखते रहे
आँखों से झलक आये जो अश्क उनके भी फ़िराक़ ए यार में
रब की रेहमत से मायूस ना हैं इतनी अज़ीयत पा कर भी
उनके बहते अश्कों पर रब अपना जलवा दिखाएगा
अनहोनी सी जो बात है अहल ए आलम के लिए उनको पूरा कर पायेगा
सहाफ़ी ज़ुबेर
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