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22/03/2023

मन-कुंतु-मौला

 मन-कुंतु-मौला


कलाम है ख़ूब ख़ास मौसिक़ी है नायाब

मुर्शिद याद आये जब जब सुना यह कलाम


एक अजीब सी कैफ़ियात हुई तारी

नम हुई आँखे तेरे इश्क़ में हमारी

अपने वजूद को भूल रक़्स करने को चाहा मन

पैराहन चाक कर दूँ जब इश्क़ के ऊरूज पर पहुंचे हम


झूम के बेसाख़्ता बोल उठे हक़ हक़ हक़

फ़िज़ाओं को बाँहों में क़ैद कर लिया

दर-ओ-दीवार को तेरे इश्क़ में चूम लिया

गया सजदे में जो ख़्याल तेरा

तेरे इश्क़ में ज़मीन का बोसा ले लिया 



है अजीब इश्क़ की यह मंज़िल

जब ना हुआ था आवारा दर बदर थे हम

जब जूनून चढ़ा तो हाजत भी बढ़ गई।



तू अपनी दरवेशी में इतना बुलंद हुआ

हाजत हुई रब से अपना जलवा दिखा

दहकता हुआ अंगारा अचानक नमूदार हुआ


चिंगारियों की है परवाज़ फ़िज़ाओं में

जैसे जुगनू रक़्स कर रहें हैं हवाओं में

रंग चढ़ा है मुझ पर यह कैसा

सारा आलम बदल गया है जैसा


इस बाग़ की हर शाख़ हो गई मेहफ़ूज़

तिजारत हुज्जत फ़लसफ़ी में हर शाख़ हुई मक़बूल


संभालेगा फिर कौन मकतब-ए-फ़िक्र

गद्दी नशीन होगा वही जो है ज़हीन


सहाफ़ी ज़ुबेर

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