मन-कुंतु-मौला
कलाम है ख़ूब ख़ास मौसिक़ी है नायाब
मुर्शिद याद आये जब जब सुना यह कलाम
एक अजीब सी कैफ़ियात हुई तारी
नम हुई आँखे तेरे इश्क़ में हमारी
अपने वजूद को भूल रक़्स करने को चाहा मन
पैराहन चाक कर दूँ जब इश्क़ के ऊरूज पर पहुंचे हम
झूम के बेसाख़्ता बोल उठे हक़ हक़ हक़
फ़िज़ाओं को बाँहों में क़ैद कर लिया
दर-ओ-दीवार को तेरे इश्क़ में चूम लिया
आ गया सजदे में जो ख़्याल तेरा
तेरे इश्क़ में ज़मीन का बोसा ले लिया
है अजीब इश्क़ की यह मंज़िल
जब ना हुआ था आवारा दर बदर थे
हम
तू अपनी दरवेशी में इतना बुलंद
हुआ
हाजत हुई रब से अपना जलवा दिखा
चिंगारियों की है परवाज़ फ़िज़ाओं
में
रंग चढ़ा है मुझ पर यह कैसा
इस बाग़ की हर शाख़ हो गई मेहफ़ूज़
संभालेगा फिर कौन मकतब-ए-फ़िक्र
सहाफ़ी ज़ुबेर
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