बढ़ता गया दायरा ऐ वहदानियत
घटती गई तेरे ख़ुदा की अकसरियत
जो अरबों में थे वोह हो गए महदूत
तुम हिन्द में रह कर हो गए मेहबूब
उनकी सिफ़त हो गई महदूत तुम हो गए ला-महदूत
कोई मिल गया मट्टी में कोई पहुंच गया फ़र्श से अर्श पर
तुम करते रहे मश्क़ ऐ वहदत
ज़ाहिर ना की अपनी हक़ीक़त
जब हुए रू बरू तुम और हम
हुई मुसर्रत मिल कर एक हुए तुम और हम
बेपनाह इश्क़ हो गया है तुझसे
चोरी चोरी देखूँ तुझे झरोखे से
दिल का हाल में कहूँ तो किस से।
में हर दिल की बात करूँ अपने रब से
ना जाने क्या हुआ है, जब से तुझसे इश्क़ हुआ है
है नई कैफ़ियत नया सुरूर मिला है
लुत्फ़-अंदोज़ हुआ पा कर इश्क़ हक़ीक़ी
,तेरी मोहब्बत में दर्द मिला था
तेरे इश्क़ में सुकून मिला है।
एक अदद मोरनी के बाद दो मौर भी साथ आ गए
मोरनी काँधे पर सवार थी मौर हाथों में खेल रहे।
मिल्लत के हर दर्द से आशना है तू
शहज़ादी ऐ अरब की हिकमत से राज़ी है तू
ज़माने भर की क़ल्माश को कहना तर्क किया
जब लायानी से कही बात पर भी हो गया फैसला
मुझे अपनी फ़क़ीरी पर है ख़ूब नाज़
जो भी हाजत है, वोह देता है नवाज़
तेरे ऊपर ग़ालिब रहा तकब्बुर और ग़ुरूर ऐ मसनद नशीन
दर हक़ीक़त तू भी है फ़क़ीर ऐ मतीन
तूने
ज़ाहिर ना की अपनी हक़ीक़त
तू अनवार ऐ रेहमत में आये उससे क़ब्ल आ गई आफ़त
सहाफ़ी ज़ुबेर
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