दर्द की हर शिद्दत बर्दाश्त कर लेता है मुसलमां
यह ज़रूरी तो नहीं अज़ीयत उसका मुक़द्दर बन जाए।
नाबीना, समाअत से मफ़लूज हाकिम के पास
चला है तू ले कर फ़र्याद
यह ज़रूरी नहीं वोह तेरी हर बात समझ जाए ।।
मुसन्निफ़ हूँ तहरीर करता हूँ अलफ़ाज़
मुसव्विर है तू क़ियाफ़ा-शनासी हर किरदार
मुसव्विर ने ना किये तेरे आज़ा बर्बाद
तेरी ख़ामोशी ने तक़दीर में तेरे लिख दी बर्बादी
किसी के हिस्से में ख़्वाब आये,
किसी की क़िस्मत में हक़ीक़त
किसी की क़िस्मत में नींद आई,
किसी के हिस्से में फ़ुर्क़त
जाम ऐ आशिक़ी है तेरी सोहबत
नशा है तेरी सिफ़त
मेरी ज़ुबान है या अलफ़ाज़ की क़लम
मुँह खोलते ही हो जाते हैं फ़ैसले
सहाफ़ी ज़ुबेर
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