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18/03/2023

महफ़िल-ए-इश्क़

 तेरा क़ौल ठुकरा दिया, सुन्नत को तर्क किया

तू बदनसीबों में शुमार हुआ ऐ मुसलमां 

जब तूने हर अमल ख़िलाफ़ ऐ रब किया।  


फ़र्ज़-ए-मंसबी ना आया निभाना तुझको 

अदल के मनसब पर जब फ़ाइज़ हुआ तू 

ना थी इंसाफ़ के क़त्ल पर ज़ुबाँ पर तेरी लुकनत  

अदलिया की मसनद पर फ़ाइज़ था ग़ुलाम ऐ हुकूमत

 

ख़ुद ही सज़ा तज़वीज़ कर ली तूने अपने लिए  

जब तेरे ज़मीर ने किया तुझको मलामत 

  

अल्फ़ाज़ ऐ हक़ सिर्फ देखे गए पड़े गए

असल ज़िन्दगी में इख़्तेयार नहीं किये गए 


बे ऐब नहीं गुनाहों से नहीं हूँ पाक 

या रब या तो मुझे गुनाहों से कर दे पाक    

गर नहीं है मेरा नशेमन जन्नत   

मुझे अज़ाबे क़ब्र, जहन्नुम की तपिश

बर्दाशत की दे दे क़ुव्वत है पस यही फ़र्याद


अहले मुसलमां को अपने साये से भी है डर लगता

ज़ुल्म तशद्दुद से हो जाता है ख़ौफ़ ज़दा

जिस मुसलमान की होती है दिन में ५ बार

हाकिमों के हाकिम से मुलाक़ात

उसे क्या डरा सकेगा किसी भी दौर का जल्लाद


ना मिली हिन्द से सच्ची हमने मोहब्बत कर ली पाक  

ना मिली हमें तुझसे मोहब्बत हमने कर ली रब से बात 


जब क़ुव्वत ऐ बर्दाशत दे गई जवाब 

हमने ख़ुद को भिगो दिया पी ली महफ़िल-ए-इश्क़ की शराब

 

दूर से ही पूछ लेता हूँ अहवाल तेरा दिल ए बे-क़रार

अब आना तुम्हारा हो गया दुशवार


सहाफ़ी ज़ुबेर

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