तुझसे तोहफ़े मिलने की तवक़्क़ो करता हूँ रब्बे क़दीर
तुझसे ही मन्नत पूरी होने की हिकमत की उम्मीद
कुन पर हुई क़ायम कायनात, अमल पर हुज्जत तमाम
में आतिशे नार से कियों रहूँ ख़ौफ़ ज़दा
उस दुनियां में जन्नत भी जहन्नुम भी प्यारी
लगती है मौला
इस दुनियां में सूरज
की तपिश अज़ीज़ लगने लगी
क़मर की मीठी चांदनी
दोनों आलम की तख़्लीक़
की है तूने
कियों ना मोहब्बत करूँ तेरी हर पैदा कर्दा चीज़ से मौला
इश्क़ वाले हैं वोह
जो इश्क़ का मतलब समझा गए
माहे मुकर्रम में
जो सवंर गए
इश्क़ में माबूद-ए-हक़ीक़ी का सबील पी लिया
फरिश्तों और हमको इश्क़ का दर्स दे गए
तेरी आमद से दोनों
आलम महक गए
ले गए फ़रिश्ते तुझे
इत्र मुश्क छिड़कते गए
बेख़ौफ़ तू सो गया अपने मेहबूब का दीदार कर ग़ार में
जैसे दूल्हा सो रहा है अपनी दुल्हन की आग़ोश में
सहाफ़ी ज़ुबेर
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