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16/10/2023

शेरों के जिगर

क़स्ब ए हलाल में बड़ी है बरकत बड़ा ही लुत्फ़

हराम लुक़मा खाने से तो बेहतर है फ़ाक़ा कशी से मर जाए तू


यह तो अपने अपने नुत्फ़े और तालीम का है असर 

तुम्हारी नस्लों में पैदा होतें हैं ज़ालिम, नाइंसाफ़, फ़िरक़ापरस्त 

मशहूर हुआ अब्बा जान माफ़ी बाज़ और चचा जान लुगाई से फ़रार

कश्मीर, फ़लस्तीनी माँओं ने पैदा किये शेरों से जिगर

मेरे ख़ुशी के आंसू झलक आये जब हर जानिब एक ही परचम देखे 

तुझे बेइख़्तयार गले लगाना चाहा क़ाबू पाया जज़बात पर जब हुजूम अवाम देखे 

महफ़िल ए यार में हर ख़ास-ओ-आम देखे ना देखे तो बस नाइन्साफ़, ज़ालिम ना देखे 


तुम्हारे आबा-ओ-अजदाद ने चमन को सींचा था अपने लहू से कभी

तुम अपने हिस्से की क़ुर्बानी दे चुके नस्लों को भोगने दो ख़ुशी 


मज़लूमों की बस्तियाँ उजाड़ के हमारे अपनों को गोली मार के 

ज़ालिम को ख़ुशी मिलती है 

क़ुदरत का क़हर जब ज़ालिम को तबाह करता है 

हमें तस्कीन होती है 


बुज़दिल, कमज़ोर ज़न्खे फ़रार हो जातें हैं 

या ज़ालिम के साथ हो जातें हैं या तो माफ़ी मांग लेते हैं। 

शेरों के जिगर वाले ज़ालिम से हर ज़ुल्म का हिसाब माँगतें हैं     

 या तो ज़ालिम को ख़लास करतें हैं या ख़ुद ख़लास होतें हैं 


अज़ीज़ नाज़रीन,

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