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27/10/2023

तू माशूक़ को गले लगा सकता है

 फ़रिश्तों से फ़रिश्ते डरा नहीं करते

हक़ के सिपाही कभी बातिल के आगे झुका नहीं करते

शैतानी उलूम पर होगा यक़ीन तुझको

हम कलाम ए हक़ के सिवा किसी पर भरोसा नहीं करते 

तेरी दरवेशी पे कहीं ना हुरूफ़ उठ जाएँ ग़ौस

जो करते हैं तनक़ीद अपने जिस्म से मक्खी भी हटा नहीं सकते 

दिखा दो करामात के वली कभी मरा नहीं करते

 

तेरी ख़्वाबगाह का हर शैतान जला डाला जाएगा

क़ुव्वत फ़राहम की रब ने हक़ के सिपाहियों को 

ना तू बचेगा ना तेरा मुहाफ़िज़ हर ज़ालिम मारा जाएगा

 

बड़ी ही बेदर्दी से तुझे घसीटा जाएगा 

तू ज़ुल्म पर ज़ुल्म कर चूका 

जब तेरे गुनाहों, ज़ुल्म, दहशत, नाइंसाफ़ी का हिसाब होगा 

कोई ना तेरे साथ होगा तू ख़ुद को तनहा और मफ़लूज पायेगा 

 

जिस बेरहमी से टूटे हैं तुझ पर हक़ के सिपाही 

यह क़ुव्वत उनकी नहीं पर है ख़ुदा की अताई

आज नहीं बचेगा ज़ालिम ले आ अपने शैतानी मुहाफ़िज़ 

हर ज़ालिम को आज मौत है तेरे हर साथी को रूस्वाई 

 

आ गई कहाँ से वही क़ुव्वत माज़ी के उस नारे में

जब आ गया ईमान का दर्जा मुजाहिदों में 

ख़ौफ़ दिख रहा है ज़ालिम के सिपाहियों में 

मौत से ना बचेगा ज़ालिम ना उसका एक भी सिपाही

 

सब फ़ना हो जाएगा सब तबाह हो जाएगा

शैतान का हर मर्कज़ जल कर ख़ाक़ हो जाएगा  

अब नहीं है तेरा मुक़ाबला इंसानों से 

तू भरोसा करता रहा शैतान पर 

रब ने भेज दिए फ़रिश्ते इंसानों के हुजूम में

 

तेरे शैतानों के लिए तो माशूक़ की ज़ुल्फ़ें ही काफ़ी थी

माशूक़ की ज़ुल्फ़ों से जो भी उलझा उसको फिर कहाँ माफ़ी थी।  

तू समझने से रहा क़ासिर तेरे लिए यह बात काफ़ी थी। 

 

इम्तेहान दे चुके तुम अब तमग़ा ए इम्तेयाज़ की है बारी 

क़तर सर ए फ़ेहरिस्त रहा शाहे ईरान को भी एजाज़ है 

 

तेरी आरज़ू हुई पूरी दरवेश, तेरे अश्कों की रब ने रखी लाज है

तू माशूक़ को गले लगा सकता है, उसका हाथ पकड़ चूम सकता है 

 

सहाफ़ी ज़ुबेर 

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