जब तक टूटेगा नहीं तब तक झुकेगा नहीं
जब तक झुकेगा नहीं तब तक मरेगा नहीं।
बाद हर रात की तारीकी के एक नई सुबह का होता है आग़ाज़
हर रोज़ चाँद के ग़ुरूब होने पर नया आफ़ताब नमूदार होता है
अमावस की आरज़ी रात को मुस्तक़िल तारीकी समझ बैठा है ज़ालिम
जब गर्द ग़ुबार हटेगा जब फ़िज़ाओं से धूवाँ छटेगा तब क्या करेगा बातिल
हर शैतान फ़ना होने वाला है, हर ज़ालिम मारा जाने वाला है
तू हौसला ना छोड़ ए मुसलमां मौजूदा वक़्त पर
दौर ए हक़ आने वाला है
जो करते है लतीफ़े झूठी फ़रेबी बातों पर
ऐसी झूठी ख़बरों का ख़ात्मा होने वाला है
ऐसी फ़रेबी बातों वालों को तुमने ही तो जेल में डाला था
इस दौर में भी इनके नाम दर्ज करो कौन इनको टांगने वाला है
इस दुखे हुए दिल को इस दौर के इबनुल अरबी ने संभाला है
ख़तम होते मुजाहिद को तेरे तिब्बी उलूम का सहारा है
क़ुव्वत पाई जब उसने हर ज़ालिम को ख़तम कर डाला है।
उनके तिजारती मुहायदे मन्सूख़ करो
सिर्फ़ हक़ वालों को रहने दो हर ज़ालिम के मुलाज़िम बाहर करो
जिन्होंने तबाह की हमारी बस्तियां ऐसे ज़ालिमों को क़ैद करो
मुक़द्दस से ले कर हिजाज़ तक
फ़ारस से ले कर पाक तक वाहिद का नारा आम करो
ज़ालिम की उस ज़मीन से नाइंसाफी को ख़त्म कर
एक ही परचम बुलंद करो
फ़तह है जब तुम्हारा मुक़द्दर तो
ग़ाज़ी को इबनुल अरबी मिलने वाला है
जब ज़ालिम के जादू पर रब की चलेगी चाबुक
ग़ोरी को मोईनुद्दीन दिखने वाला है
है कोई ज़ालिम नाइंसाफ़ शैतानी मरकज़
जो हक़ के अदल और इंसाफ़ से बचने वाला है
है कोई तुम में से ऐसा मर्द मुजाहिद
जो ज़ुल्म नाइंसाफ़ी के मर्कज़ को तोड़ सके
ख़ाना जंगी, ख़ूंरेज़ी की अज़ीयत से निजात दे
इंसाफ़ का निज़ाम क़ायम करे
सहाफ़ी ज़ुबेर
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں