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08/10/2023

सलाम है तेरे जज़्बे को फ़लस्तीन

सलाम है तेरे जज़्बे को फ़लस्तीन जब तवानाई में उमगों की बहार थी 

शबाब ने जवानी के वलवलों में ख़ुदा को याद किया  

जंग में अपनी ज़ईफ़ी को भूल हर शख़्स ने उम्र के असा को तोड़ दिया 


नसब बुतों से ज़्यादा ख़तरनाक ईमान वाले में 

मौजूद ज़ालिम के ख़ौफ़ का बूत होता है 

हर ज़ुल्म पर ज़ालिम से ख़ौफ़ ज़दा 

उसके लिए ख़ामोश बूत बने रहना ही बेहतर होता है


तेरे बहादुरी और ज़हानत के सारे राज़ फ़ाश हो गए 

ना कोई राज़दार रहा ना कोई तेरा रहबर,

बोहोत बड़े बड़े बोल बोला था, 

तेरी दहशत और ज़ुल्म को हमारी नस्लों ने भोगा था


हर रोज़ की वही कहानी थी, कभी हमारे मासूमों के ख़ून से होली  

कभी तेरी फौज ने घूस कर हमारी बस्तियां उजाड़ी थी


अक़्सा में हर रोज़ की वही कहानी थी 

हाथ पैर बाँध हमारे नौजवानों को ज़मीन पर गोलियां मारी थी 

  

७० साल से हर रोज़ हमने तेरी दहशत को भोगा है 

सिर्फ़ एक रोज़ हमने जवाब दिया तो सहाफ़त और जहाँ कियों रोता है


अमन की बर्बादी के तुम दो ही हो ज़िम्मेदार

एक अक़्सा दूजा बाबरी पर किया हुआ वार


हमारी नस्लों मासूमों पर चली थी जब गोलियां 

कहाँ थे वोह फ़ौज के कलंदर जो बोल रहें हैं बड़ी बोलियां


हमारी तबाही पर सबके थे ख़ुश्क आंसू 

जब तबाही बना मुक्क़द्दर तुम्हारा तो झलक पड़े सबके आंसू 

हमने अपनी दिफ़ा की है दहशतगर्दी तो हाकिम की बड़ी है।   


बड़े क़सीदे लिख दिए बोल दिए ज़ालिम की शान में 

अगर ज़ुल्म हुआ ही ना होता तो बात ना आता तुम्हारी आन पे  


तुमको हक़ है अपनी दिफ़ा का 

हमारी नस्लें क्या यतीम बे-यार-ओ-मददगार हैं 


तुम्हारे हाथ में हाकिम हैं हमारे साथ हाकिमो का हाकिम है।   

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