जब दरवेश ने अपनी हक़ीक़त ना दिखाई
नहीं तेरी सिफ़त आम करे वोह बात जो उसने छुपाई
तेरी जानिब से जो अता है उसको अलहदा क़ुव्वत
वोह करामात उसको भी नहीं मालूम जो तूने दिखाई
जो ज़ाहिर हुआ तेरा फैज़ था, जो छुपा लिया मेरी इबादत
ना वोह जूनून रहा ना वोह दीवानगी अहल ए बातिल पर
जब हाकिम ख़ुद ही झुक गया हर ज़ुल्म के क़ाफ़िर पर
ख़ूब चल पड़ी है शायरों की ज़ुबान दौर ए फ़िराक़ में
हम पर तो माशूक़ के इश्क़ का ग़लबा तारी रहा हर दौर पर
तेरी ज़ुल्फ़ों की बात करूँ या तेरे कजरारे नयनों की
उस दस्त-ए-शफ़क़त की बात करूँ या अताई पैरहन की
बेख़बरी है ऐसी हावी कुछ याद नहीं सिर्फ़ तेरी मोहब्बत ही याद रही
हुजूम मुस्लिम की मार्चपास्ट से दुश्मन का जिगर फटता है
एक फूंक में वोह है ताक़त दुश्मन का क़िला हवा की तरह उड़ता है।
जब तनहा मुस्लिम चलता है तब हूजूमी दहशत का शिकार होता है।
एक ईमान वाला कहीं भी कभी भी तनहा चलता है उसको देख दुश्मन डरता है।
फ़तह तुम्हारी अकसरिय्यत में नहीं ईमान की ख़ुसूसियत में है
गर कुफ़्र को करना है फ़तह
तो ईमान वाले बनो, देख तुम्हारा ईमानी दर्जा दुश्मन ख़ुद ब ख़ुद मर जाएगा।
देख तुम्हारा उम्मा के लये जज़्बा दुशमन डर जाएगा
सहाफ़ी ज़ुबेर
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