तेरे नाम के आगे इस्म ए अहमद लग गया
चिराग़ मोहब्बत का रोशन हो गया
दीपक मक़बूल हो गया ओहदा उसका बड़ गया
ईंधन नहीं था तेरे चिराग़ में था दर बदर फिर रहा
मोहम्मद का नाम मिल गया तू मशहूर और मारुफ़ हो गया
ला इलाहा इल्लाह के क़िले में दाखिल होना
है बोहोत आसान
इस पर क़ायम रेहाना कठिन है बोहोत इम्तेहान
बोहोत हो चूका मिल्लत पर ज़ुल्म बर्बरियत नाइंसाफी का वार
हक़ दो जो भी जाइज़ है हमारा
और सरहद तरमीन करो इज़ाफ़ा
कब तक सहेगें नाइंसाफ़ी ज़ुल्म तुम्हारा
हम भी चले जायेगें वहाँ जो है मुल्क हमारा
मस्जिदें शहीद की तोड़ दिया मदरसा खानकाह
हक़ तलाफ़ी सह ली बोहोत अब हक़ दो हमारा
क्यों ख़ामोशी छाई हुई है हमारे हर सवाल पर
कब तक हक़तल्फ़ी का बोझ ढोते जवान नस्लें ख़ुदारा
दो क़ौमी या तीन क़ौमी नज़रिये पर क्या जवाब है तुम्हारा
दो क़ौमी नज़रिये में सरहद का इज़ाफ़ा
तीन क़ौमी पर एक और बटवारा
तुम्हे मुसलमान नाम से नफ़रत, छोड़ दिया साथ हमारा
अब हम भी ज़हन बना चुके नहीं चाहिए साथ तुम्हारा
कहीं तो जा कर ख़त्म हो यह ज़हर खून ख़राबा
सहाफ़ी ज़ुबेर
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں