है तुमको ज़रुरत बिलबिलाने की चीखने चिल्लाने की
की पहुंचे लाहौर तक आवाज़
उनकी ख़ामोशी से की गई तदबीर ने हिला दी हिन्द बुनियाद
तुम्हारी है आदत करने विधवा विलाप
तुम उजड़ गए सिन्दूर उजड़ गया करते रहे विधवा विलाप
पड़ौसी सँवर गया हुआ शाद बाद तब भी वही विलाप
तुम्हारे अंदर रही कहाँ वोह क़ुव्वत ना रहा जवानी का जोश
ज़ईफ़ इरादे हैं और पस्त है आवाज़
लगा लो कितना भी ज़ोर रहेगा ५ सेकंड वाला हाल
मुँह में दाँत नहीं पेट में आंत नहीं पहुंचेगी कैसे
लाहौर तक तुम्हारी आवाज़
आवाज़ निकलती है ऐसी जैसे पड़ौसी ने पान खा कर
पीक थूक दिया खड़े हो कर बीच बज़ार
चाहे जितना पिला दो ज़ईफ़ों को टॉनिक
एक थके हुए ज़ईफ़ से तवक़्क़ो और क्या होगी ७० साल बाद
हम ईद पर सिर्फ़ बकरे नहीं गाये बैल और ऊँट भी काटते
जंग के मैदान में दुश्मन के सर काटते
मुनाफ़िक़ मिला गर कोई मिल्लत में
सबसे पहले गर्दन उसकी काटते
अभी तक ऐसी महारत नहीं आई जो ज़नख़ों को
बना दे जोशीला मर्द जवाँन
लंगूर बरादरी के मुक्क़द्दर में रहेगा वही पड़ौसी
देवर जैठ ससुर या पसंदीदा मर्द जवाँ
मेरे भारत देश का क्या कहना है इतना महान
बाँट दिया भारतियों को मज़हब में
खड़ी कर दी इंसानों के बीच में दिवार
मुस्तक़बिल में ऐसे ही ज़हरीले बांटेगें हिन्द को
खड़ा कर मज़हबी इख़्तेलाफ़
हम फ़क़ीरों का क्या है झोला ले के चल पड़ेगें जी
पाने माशूक़ का दीदार
सहाफ़ी ज़ुबेर
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