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04/02/2026

पहुंचे लाहौर तक आवाज़

 है तुमको ज़रुरत बिलबिलाने की चीखने चिल्लाने की 

की पहुंचे लाहौर तक आवाज़ 

उनकी ख़ामोशी से की गई तदबीर ने हिला दी हिन्द बुनियाद 


तुम्हारी है आदत करने विधवा विलाप 

तुम उजड़ गए सिन्दूर उजड़ गया करते रहे विधवा विलाप 

पड़ौसी सँवर गया हुआ शाद बाद तब भी वही विलाप 


तुम्हारे अंदर रही कहाँ वोह क़ुव्वत ना रहा जवानी का जोश 

ज़ईफ़ इरादे हैं और पस्त है आवाज़ 

लगा लो कितना भी ज़ोर रहेगा ५ सेकंड वाला हाल 


मुँह में दाँत नहीं पेट में आंत नहीं पहुंचेगी कैसे

लाहौर तक तुम्हारी आवाज़ 


आवाज़ निकलती है ऐसी जैसे पड़ौसी ने पान खा कर 

पीक थूक दिया खड़े हो कर बीच बज़ार 


चाहे जितना पिला दो ज़ईफ़ों को टॉनिक 

एक थके हुए ज़ईफ़ से तवक़्क़ो और क्या होगी ७० साल बाद


हम ईद पर सिर्फ़ बकरे नहीं गाये बैल और ऊँट भी काटते 

जंग के मैदान में दुश्मन के सर काटते 

मुनाफ़िक़ मिला गर कोई मिल्लत में 

सबसे पहले गर्दन उसकी काटते 


अभी तक ऐसी महारत नहीं आई जो ज़नख़ों को 

बना दे जोशीला मर्द जवाँन


लंगूर बरादरी के मुक्क़द्दर में रहेगा वही पड़ौसी 

देवर जैठ ससुर या पसंदीदा मर्द जवाँ 


मेरे भारत देश का क्या कहना है इतना महान 

बाँट दिया भारतियों को मज़हब में 

खड़ी कर दी इंसानों के बीच में दिवार  


मुस्तक़बिल में ऐसे ही ज़हरीले बांटेगें हिन्द को 

खड़ा कर मज़हबी इख़्तेलाफ़ 


हम फ़क़ीरों का क्या है झोला ले के चल पड़ेगें जी 

पाने माशूक़ का दीदार


सहाफ़ी ज़ुबेर

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